सारनाथ में सम्राट अशोक की विरासत को पुनर्स्मरण करने की जरूरत: प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह

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वाराणसी। कुशवाहा महासभा वाराणसी द्वारा पहाड़िया स्थित अशोका इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट में आयोजित ‘उत्कर्ष पर्व’ समारोह में वीर कुंवर विश्वविद्यालय, आरा के प्रख्यात इतिहासकार प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने सम्राट अशोक और उनकी ऐतिहासिक विरासत पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने विशेष रूप से सारनाथ की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह स्थान बौद्ध धर्म के प्रसार का केंद्र रहा है, जहां सम्राट अशोक ने अपना प्रसिद्ध अशोक स्तंभ स्थापित करवाया था। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध ने यहीं पर ‘धर्मचक्र प्रवर्तन किया, जिसके कारण यह स्थान बौद्ध अनुयायियों के लिए पवित्र तीर्थस्थल बन गया। सम्राट अशोक ने इसे संरक्षित करने के लिए कई स्तूपों और स्मारकों का निर्माण करवाया, जिनमें धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप और अशोक स्तंभ प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि अशोक स्तंभ पर अंकित चिह्न आज भारत की राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बन चुका है। प्रो. सिंह ने बताया कि सम्राट अशोक का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका प्रभाव चीन, जापान, कंबोडिया, म्यांमार और थाईलैंड तक फैला था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चीन के सम्राट लिआओ-कुटी ने अशोक की स्मृति में मंदिर बनवाया, जापान में कई शासकों ने ‘सम्राट अशोक’ की उपाधि धारण की और कंबोडिया में जयवर्मन सप्तम को ‘कंबोडिया का सम्राट अशोक’ कहा जाता था। उन्होंने सिकंदर को ‘विश्वविजेता’ कहे जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिकंदर ने केवल एशिया का 5% हिस्सा जीता था, जबकि सम्राट अशोक ने अपने ज्ञान, नीति और धम्म संदेश से पूरे एशिया को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि यदि पांच प्रतिशत भूमि जीतने वाला ‘विश्वविजेता’ हो सकता है, तो पूरे एशिया में शांति और धर्म स्थापित करने वाले सम्राट अशोक को क्यों नहीं? प्रो. सिंह ने कहा कि सम्राट अशोक का शासन दुनिया का पहला कल्याणकारी शासन था, जिसमें मानव ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी चिकित्सा व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में सम्राट अशोक को वह सम्मान नहीं मिला, जो विदेशों में उन्हें प्राप्त है। उन्होंने कहा कि चीन में हजार साल पहले उनके नाम पर मंदिर बनाए गए, लेकिन भारत में उनके नाम पर कोई बड़ा स्मारक या मंदिर नहीं है। उन्होंने बताया कि सम्राट अशोक की नीतियां आधुनिक प्रशासन और कानून की नींव बनीं। उनके द्वारा निर्मित ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) आज भी भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से होकर गुजरती है। उन्होंने कहा कि सम्राट अशोक की धम्म विजय की अवधारणा आज भी प्रासंगिक है, जब दुनिया युद्ध और संघर्षों से जूझ रही है। प्रो. सिंह ने भारतवासियों से आह्वान किया कि वे अपने गौरवशाली अतीत को पहचानें और सम्राट अशोक के सिद्धांतों को अपनाकर समाज में शांति, सद्भाव और कल्याणकारी शासन की नींव रखें। उन्होंने कहा कि सम्राट अशोक ने धर्म, नीति और प्रशासन को जिस तरह से जोड़ा, वह आज भी अनुकरणीय है। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंजीनियर अंकित कुमार मौर्य, अध्यक्ष, अशोका इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट ने की। इस अवसर पर जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्य, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधुकर मौर्य, डॉ. बिंद्रा प्रसाद मौर्य (पूर्व प्रधानाचार्य, विद्या विहार इंटर कॉलेज), कन्हैयालाल मौर्य (पूर्व प्रधानाचार्य, टांडा इंटर कॉलेज), भंते बुद्ध ज्योति (न्यू सारनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट, रामनगर) सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इस दौरान समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन पूर्व ग्राम प्रधान संजय मौर्य ने किया और पवन बनारसी ने अपने मधुर गीतों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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