व्याख्यानमाला में आचार्य माधव कृष्ण ने विवेक चूड़ामणि पर रखा विचार

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*व्याख्यानमाला में आचार्य माधव कृष्ण ने विवेक चूड़ामणि पर रखा विचार* गाजीपुर।श्री गंगा आश्रम द्वारा आयोजित 47वें मानवता अभ्युदय महायज्ञ के चौथे दिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। श्रीरामचरित मानस का नवाह्न पारायण, वैदिक हवन, दोपहर और शाम का भंडारा, मानव धर्म प्रसार व्याख्यानमाला के माध्यम से परमहंस बाबा गंगारामदास की पुण्य तपस्थली मनुष्यता की स्थापना के लिए प्रयासरत रही।व्याख्यानमाला में साहित्यकार माधव कृष्ण ने विवेक चूड़ामणि पर अपनी अपनी भाष्य श्रृंखला को जारी रखते हुए कहा कि, भ्रम के कारण हम रस्सी को सर्प समझ लेते हैं जो भय और दुख का कारण बनता है। इसलिए वास्तविकता पर सम्यक विचार करने से ही यह समाप्त होगा, अंधाधुंध कर्म करने से कुछ नहीं होगा। कर्म करने से पूर्व विचार करना होगा कि वास्तविकता क्या है। गुरु द्वारा हमारे हित के लिए दिए गए उपदेश पर विचार करने से परमार्थ का निश्चय होता है। पवित्र नदियों में स्नान या राजस तामस दान या सैकड़ों प्राणायाम से भी सत्य का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता है।यही मंतव्य भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन के सामने रखा कि, सत्य की उपलब्धि केवल वेद यज्ञ अध्ययन दान तप क्रियाओं और घोर तप से नहीं होती है। इसकी उपलब्धि केवल अनन्य भक्ति से होती है जिसे आदि शंकर ने जिज्ञासोरात्मवस्तुन: कहा है। केवल आत्मतत्व की जिज्ञास, अन्य कुछ नहीं। इस लिए एक साधक को विचार करने के लिए सही दिशा के लिए गुरु के पास जाना चाहिए। गुरु वही हो सकता है जो दयासिंधु और ब्रह्मविदुत्तम हो। ब्रह्म को जानने वालों में श्रेष्ठ व्यक्ति ही गुरु हो सकता है। बापू जी ने मानस के ज्ञान दीपक प्रकरण पर जारी व्याख्यान में आगे कहा कि, सात्त्विक श्रद्धा रूपी ज्ञान को शुभ धर्म आचरण रूपी हरी घास खिलाना चाहिए। हरी घास का अर्थ है कि जप, तप, व्रत इत्यादि कर्म यांत्रिक नहीं होने चाहिए अन्यथा ये शुष्क व्यायाम के अतिरिक्त कुछ नहीं होंगें। इनमें भाव होना चाहिए। धर्म को दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए जैसे शिवि ने दया को पकड़ा था, दधीचि ने परोपकार को, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य को।गोस्वामी तुलसीदास जी ने परहित, अहिंसा, सत्य को परम धर्म माना है। भागवत के अनुसार धर्म रूपी गाय के चार पैर हैं: तप शौच दया सत्य। कलिकाल में केवल सत्य को पकड़ लेने से ही सब कुछ मिल जाता है। इस प्रक्रिया पर आरम्भ में श्रद्धा रखना पड़ेगा जो कालान्तर में विश्वास में बदल जाता है।दिनकर समाप्ति गुरु अर्चना, ईश्वर विनय, सार्वजनिक प्रसाद वितरण से हुआं।

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